वाल्मीकि रामायण 7.27.4
आदित्यान्सवसून्रुद्रान्विश्वान्साध्यान्मरुद्गणान् ।सज्जीभवत युद्धार्थं रावणस्य दुरात्मनः॥
ādityānsavasūnrudrānviśvānsādhyānmarudgaṇān |sajjībhavata yuddhārthaṃ rāvaṇasya durātmanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें