वाल्मीकि रामायण 7.29.15
नह्येष हन्तुं शक्यो ऽद्य वरदानात्सुनिर्भयः ।तद्ग्रहीष्यामहे रक्षो यत्ता भवत संयुगे॥
nahyeṣa hantuṃ śakyo 'dya varadānātsunirbhayaḥ |tadgrahīṣyāmahe rakṣo yattā bhavata saṃyuge ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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