वाल्मीकि रामायण 7.36.4
स्पृष्टमात्रस्ततः सो ऽथ सलीलं पद्मयोनिना ।जलसिक्तं यथा सस्यं पुनर्जीवितमाप्तवान्॥
spṛṣṭamātrastataḥ so 'tha salīlaṃ padmayoninā |jalasiktaṃ yathā sasyaṃ punarjīvitamāptavān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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