वाल्मीकि रामायण 7.43.2
विजयो मधुमत्तश्च काश्यपो मङ्गलः कुटः ।सुराजः कालियो भद्रो दन्तवक्रः सुमागधः॥
vijayo madhumattaśca kāśyapo maṅgalaḥ kuṭaḥ |surājaḥ kāliyo bhadro dantavakraḥ sumāgadhaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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