वाल्मीकि रामायण 7.46.20
योजयस्व रथं शीघ्रमद्य भागीरथीजलम् ।शिरसा धारयिष्यामि त्र्यम्बकः पर्वते यथा॥
yojayasva rathaṃ śīghramadya bhāgīrathījalam |śirasā dhārayiṣyāmi tryambakaḥ parvate yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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