वाल्मीकि रामायण 7.55.8
ततः पितरमामन्त्र्य इक्ष्वाकुं हि मनोः सुतम् ।वसिष्ठं वरयामास पूर्वं ब्रह्मर्षिसत्तमम्॥
tataḥ pitaramāmantrya ikṣvākuṃ hi manoḥ sutam |vasiṣṭhaṃ varayāmāsa pūrvaṃ brahmarṣisattamam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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