वाल्मीकि रामायण 7.56.3
लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु रामश्चेक्ष्वाकुनन्दनः ।प्रत्युवाच महातेजा लक्ष्मणं पुरुषर्षभः॥
lakṣmaṇenaivamuktastu rāmaścekṣvākunandanaḥ |pratyuvāca mahātejā lakṣmaṇaṃ puruṣarṣabhaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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