वाल्मीकि रामायण 7.56.4
तौ परस्परशापेन देहावुत्सृज्य धार्मिकौ ।अभूतां नृपविप्रर्षी वायुभूतौ तपोधनौ॥
tau parasparaśāpena dehāvutsṛjya dhārmikau |abhūtāṃ nṛpaviprarṣī vāyubhūtau tapodhanau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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