वाल्मीकि रामायण 7.62.2
राघवस्य वचः श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते ।ततो निवेदयामासुर्लवणो ववृधे यथा॥
rāghavasya vacaḥ śrutvā ṛṣayaḥ sarva eva te |tato nivedayāmāsurlavaṇo vavṛdhe yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें