वाल्मीकि रामायण 7.70.2
दिष्ट्या ते विजयो वत्स दिष्ट्या लवणराक्षसः ।हतः पुरुषशार्दूल वरं वरय सुव्रत॥
diṣṭyā te vijayo vatsa diṣṭyā lavaṇarākṣasaḥ |hataḥ puruṣaśārdūla varaṃ varaya suvrata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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