वाल्मीकि रामायण 4.19.4
सा सपुत्र अप्रियम् श्रुत्वा वधम् भर्तुः सुदारुणम् ।निष्पपात भृशम् तस्मात् उद्विग्ना गिरि कंदरात्॥
sā saputra apriyam śrutvā vadham bhartuḥ sudāruṇam |niṣpapāta bhṛśam tasmāt udvignā giri kaṃdarāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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