वाल्मीकि रामायण 4.39.8
एतस्मिन् अन्तरे च एव रजः समभिवर्तत ।उष्णाम् तीव्राम् सहस्रांशोः छादयत् गगने प्रभाम्॥
etasmin antare ca eva rajaḥ samabhivartata |uṣṇām tīvrām sahasrāṃśoḥ chādayat gagane prabhām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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