वाल्मीकि रामायण 4.42.50
एतावत् जीव लोकस्य भास्करो रजनी क्षये ।कृत्वा वितिमिरम् सर्वम् अस्तम् गच्छति पर्वतम्॥
etāvat jīva lokasya bhāskaro rajanī kṣaye |kṛtvā vitimiram sarvam astam gacchati parvatam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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