वाल्मीकि रामायण 5.1.4
द्विजान् वित्रासयन् धीमानुरसा पादपान् हरन् ।मृगांश्च सुबाहुन्निघ्नन् प्रवृद्ध इव केसरी॥
dvijān vitrāsayan dhīmānurasā pādapān haran |mṛgāṃśca subāhunnighnan pravṛddha iva kesarī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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