वाल्मीकि रामायण 5.34.4
लक्ष्मणश्च महातेजा भर्तुस्ते ऽनुचरः प्रियः ।कृतवाञ्छोकसन्तप्तः शिरसा ते ऽभिवादनम्॥
lakṣmaṇaśca mahātejā bhartuste 'nucaraḥ priyaḥ |kṛtavāñchokasantaptaḥ śirasā te 'bhivādanam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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