वाल्मीकि रामायण 6.49.25
अङ्गदं तु पुरस्कृत्य ससैन्यः ससुहृज्जनः ।सागरं तर सुग्रीव नीलेन च नलेन च॥
aṅgadaṃ tu puraskṛtya sasainyaḥ sasuhṛjjanaḥ |sāgaraṃ tara sugrīva nīlena ca nalena ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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