वाल्मीकि रामायण 6.53.2
दीर्घमुष्णं विनिश्वस्य क्रोधेन कलुषीकृतः ।अब्रवीद्राक्षसं शूरं वज्रदंष्ट्रं महाबलम्॥
dīrghamuṣṇaṃ viniśvasya krodhena kaluṣīkṛtaḥ |abravīdrākṣasaṃ śūraṃ vajradaṃṣṭraṃ mahābalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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