वाल्मीकि रामायण 6.60.19
एष केतुः परः सङ्ख्ये मुख्यो वै सर्वरक्षसाम् ।कुम्भकर्णः सदा शेते मूढो ग्राम्यसुखे रतः॥
eṣa ketuḥ paraḥ saṅkhye mukhyo vai sarvarakṣasām |kumbhakarṇaḥ sadā śete mūḍho grāmyasukhe rataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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