वाल्मीकि रामायण 7.49.3
अदृष्टपूर्वा भगवन्कस्याप्येषा महात्मनः ।पत्नी श्रीरिव सम्मोहाद्विरौति विकृतानना॥
adṛṣṭapūrvā bhagavankasyāpyeṣā mahātmanaḥ |patnī śrīriva sammohādvirauti vikṛtānanā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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